शाम से आँख में नमी सी है,
आज फिर आप की कमी सी है।
रुतबा कम है मगर लाज़वाब है मेरा,
जो हर किसी के दर पर दस्तक दे,
वो किरदार नहीं है मेरा।
इतनी सी ज़िन्दगी है पर ख्वाब बहुत है,
जुर्म तो पता नहीं साहब पर इल्जाम बहुत है।
हम अपनी इस अदा पर गुरुर करते है,
किसी से प्यार हो या नफरत भरपूर करते है।
हवा गुज़र गयी पत्ते थे कुछ हिले भी नहीं,
वो मेरे शहर में आये भी और मिले भी नहीं।
ख़ुदा तूने तो लाखो की तकदीर संवारी है,
मुझे दिलासा तो दे की अब तेरी बारी हैं।
सच्ची मेरी दोस्ती आजमा के देख लो,
करके याकिन मुह पर मेरे पास आ कर देख लो।
तिनका सा मैं और समुंदर सा इश्क़,
डूबने का डर और डूबना ही इश्क़।
पूछा जो हमने किसी और के होने लगे हो क्या,
वो मुस्कुरा कर बोले पहले तुम्हारे थे क्या।
वो मोहब्बत भी तुम्हारी थी,
वो नफ़रत भी तुम्हारी थी,
हम अपनी वफ़ा का इंसाफ किससे मांगते,
वो शहर भी तुम्हारा था,
वो अदालत भी तुम्हारी थी।
दिन कुछ ऐसे गुजारता है कोई,
जैसे एहसान उतारता है कोई।
इस दौर के लोगो में वफ़ा ढूंढ रहे हो,
बड़े नादान हो साहब,
ज़हर की शीशी में दवा ढूंढ रहे हो।
आज भी गुलज़ार साहब की शायरियां हमारे दिलों को छू जाती है। उम्मीद है आपको गुलज़ार साहब की ये शायरियां पसंद आएगी खासकर Gulzar Ki Do Line Shayari आपको बेहद पंसद आएंगी।